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बैशाख की सक्रान्ति

देव भूमि हिमाचल प्रदेश में वर्ष भर देवी-देवताओं के नाम पर असंख्य मेले एंव उत्सवों का आयोजन किया जाता है जिसमें संबन्धित क्षेत्र के लोगो की अगाध श्रद्वा व आस्था जुडी होती है। धार्मिक मेलो की श्रृखंला में
कालान्तर से राजगढ़ में भी इस क्षेत्र के पीठासीन देवता ῾शिरगुल̕ के नाम पर बैशाख की सक्रान्ति के पावन पर्व पर मेले का आयोजन किया जाता है । राजगढ़ का बैशाखी मेला प्रदेश के प्रसिद् व् प्राचीन मेलों में से एक है। बैशाख मास की संक्रान्ति को इसका आयोजन होने से इसका नाम बैशाखी मेला पडा है जबकि पंजाब में मनाए जाने वाले बैशाखी पर्व से इस मेले का कोई सरोकार नहीं है । हिमाचल प्रदेश के कुछ जिला में वर्ष की चार ῾̕बड़ी साजी̕ में देवी देवताओं की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है जिनमें बैशाख संक्रान्ति जिसे स्थानीय भाषा में ῾बीशू की साजी̕ कहा जाता है भी एक है । राजगढ़ शहर के अस्तित्व में आने से पहले यह मेला ῾सरोट के टिब्बे̕ पर मनाया जाता था। इस टिब्बे पर ῾शिरगुल देवता̕ का छोटा सा मंदिर हुआ करता
था जिसे शहर के अस्तित्व में आने के उपरान्त राजगढ़ मे स्थानान्तरित किया गया था। कालान्तर से ही राजगढ़ मेला पूरे क्षेत्र के लोगो के लिए मनोरंजन  का एक मात्र साधन हुआ करता था। लोग सरोट के टिब्बे पर ῾शिरगुल मंदिर̕में नमन करने के साथ मेले का भी भरपूर आन्नद उठाते थे। लोगो का विश्वास आज भी कायम है कि शिरगुल देवता के मेले के आयोजन से समूचे क्षेत्र में शिरगुल देवता की अपार कृपा से क्षेत्र में खुशहाली और समृद्धि का सूत्रपात होता है। शिरगुल को भगवान शिव का अंशावतार माना जाता है और सिरमौर तथा जिला शिमला के अतिरिक्त पडोसी राज्य उत्तराखण्ड के जोनसार बाबर में शिरगुल की कुल देवता के नाम से अराधना की जाती है | शिरगुल को एक वीर योद्धा के रूप् में भी माना जाता है जिन्होने दिल्ली के मुगल शासक
की सेनाओं के दांत खटटे किए थे। शिरगुल देवता का इतिहास माता भंगयाणी देवी हरिपुरधार के साथ भी जुड़ा है। मेले की प्राचीन गरिमा बनाए रखने और इसे आकर्षक व मनोरंजक बनाने के लिए प्रदेश सरकार द्वारा इसे῾जिला स्तरीय बैशाखी मेले̕ का दर्जा दिया गया है। हर वर्ष यह मेला बैशाख मास की संक्रान्ति से आरंभ होकर तीन दिन तक चलता है। मेले का शुभारंभ राजगढ़ शहर में स्थित शिरगुल देवता की पारम्परिक पूजा
से होता है। गत कुछ वर्षो से मेले के पहले दिन शहर में शिरगुल देवता की पालकी पारम्परिक वाद्य यंत्रों के साथ पूरे शहर में निकाली जाती है ताकि मेले में आए सभी लोग शिरगुल देवता का आशिर्वाद प्राप्त कर सके। इस वर्ष यह मेला 13 से 15 अप्रैल तक राजगढ़ के नेहरू ग्राऊंड में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। मेले को आकर्षक बनाने के लिए मेला समिति द्वारा सांस्कृतिक संध्याओं में प्रदेश के प्रसिद्ध लोक कलाकारों को आमंत्रित किया गया है। मेले के अंतिम दिन 15 अप्रैल को विशाल दंगल होगा जिसमें उत्तरी भारत के नामी पहलवान भाग लेंगें

राजगढ़ मेला

मेले व त्यौहार प्रदेश की संस्कृति व सभ्यता के परिचायक -बडालिया
” तेरी आऊमा चूड़ी, देवा शिरगुला रे” अराधना से शुरू हुआ राजगढ़ मेला
शिरगुल शोभा यात्रा में सैकड़ों श्रद्धालुओं ने लिया भाग
फोटो सौजन्य : नितिन वल्याट।
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फागू..... 13 अप्रैल-प्रदेश का प्रसिद्ध एवं पारंपरिक जिला स्तरीय बैशाखी मेला आज राजगढ़ में शिरगुल देवता की शोभा यात्रा से आरंभ हुआ । उपायुक्त सिरमौर बीसी बडालिया ने राजगढ़ स्थित शिरगुल के प्राचीन मंदिर में पूजा अर्चना करने के उपरांत शिरगुल देवता की पालकी का नेतृत्व किया । शोभा यात्रा में सैंकड़ों की तादाद में राजगढ़ क्षेत्र के लोगों ने भाग लेकर शिरगुल देवता का आर्शिवाद प्राप्त किया । शोभा यात्रा मंदिर से आरंभ होकर बस स्टैंड से होती हुई पुरानी तहसील, मेला ग्राऊंड होते हुए वापिस मंदिर पहूंची।
इसके उपरांत उपायुक्त श्री बीसी बडालिया ने मेला स्थल पर शिरगुल मंच पर दीप प्रज्ज्वलित करके तीन दिवसीय बैशाखी मेले का विधिवत शुभारंभ किया, और साथ ही सूचना एवं जन सम्पर्क विभाग के कलाकारों द्वारा पांरम्परिक शिरगुल अराधना ” तेरी आऊमा चूड़ी देवा शिरगुला रे” गीत प्रस्तुत करके मेले के सांस्कृतिक कार्यक्रम का आरंभ किया ।

उपायुक्त ने इस अवसर पर मेले की शुभकामनाऐं देते हुए कहा कि राजगढ़ में आयोजित होने वाला यह मेला प्रदेश के प्राचीन मेलों में से एक है और कालान्तर से यह मेला इस क्षेत्र के लोगों के लिए मनोरंजन व आकर्षण का केद्र रहा है ।
उन्होने कहा कि मेले एवं त्यौहार प्रदेश की समृद्ध संस्कृति के परिचायक है, जिसमें लोगों की अगाध श्रद्धा व आस्था जुड़ी है । उन्होने कहा कि मेले के आयोजन से जहां राज्य की समृद्ध संस्कृति की झलक देखने को मिलती है, वहीं इनके आयोजन से लोगों में आपसी भाईचारा, पारस्परिक सहयोग की भावना उत्पन्न होने से राष्ट्र की एकता और अखण्डता को बल मिलता है । उन्होने कहा कि मेले को आकर्षक बनाने के साथ साथ इसकी प्राचीन गरिमा को बनाए रखा जाना चाहिए ।
उपायुक्त ने कहा कि राजगढ़ मंदिर में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए सराय निर्मित की जाएगी , जिसके लिए धनराशि का प्रावधान किया जाएगा । इस मौके स्थानीय विधायक सुरेश कश्यप भी उपस्थित थे ।
इससे पहले एसडीएम राजगढ़ एवं अध्यक्ष मेला समिति एसडी नेगी ने मुख्य अतिथि का स्वागत किया और शॉल टापी और स्मृति चिन्ह प्रदान करने के साथ साथ मेले के बारे विस्तृत जानकारी दी ।
इस मौके पर तहसीलदार कपिल तोमर, डीएसपी योगेश रोल्टा, अध्यक्ष नगर पंचायत सतीश कुमार, जिला परिषद अध्यक्षा परीक्षा चौहान, जिप सदस्य शकुन्तला प्रकाश, शिरगुल मंदिर समिति के अध्यक्ष सूरत सिंह ठाकुर, उपाध्यक्ष अरूण ठाकुर के अतिरिक्त दिनेश आर्य, विवेक शर्मा सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे ।
इस मौके पर उपायुक्त द्वारा मेले में लगाई गई विभिन्न विकासात्मक प्रदर्शनियों का भी अवलोकन किया गया।
मेले के शुभारंभ पर सूचना एवंज न सम्पर्क विभाग तथा स्थानीय स्कूली बच्चों द्वारा रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया । -0

राजगढ़ मेला इतिहास

1950 के दशक की बात है। जानेमाने लाला मंशाराम जी सूद के जब लड़कियाँ ही होने लगी तो किसी ने सलाह दी, शाया के शिरगुल महाराज से मन्नत मांगो वे अवश्य पुत्र रत्न देंगे। सच्चे मन से मन्नत मांगी और पुत्र प्राप्ति हो गई। लाला मनशा राम जी ने सरोट की धार पर शिरगुल का मन्दिर बनाया और शिरगुल महाराज को विराजित किया तथा शिरगुल देवता के नाम से बैशाख 1 गते से वहीं सरोट की ऐतिहासिक धार (यहाँ से अंग्रेजी सेना ने प्झोता क्रांतिकारियों पर 1600 गोलियां दागी थी) पर मेला भी लगाना आरम्भ किया। वहां पानी की दिक्कत और स्थान कम होने के चलते, 1962 या 63 के लगभग मेले को आज के नेहरु मैदान में लाया गया। इस मेले के हम भी प्रत्यक्ष दर्शी है जब इतना अंधड़ तूफ़ान और बारिश हुई की पंडाल भी उखड़ने लगे। तभी मेला कमेटी ने मेला स्थान बदलाव के चलते शिरगुल का कोप समझा और शायद बकरे की बलि दी। उसके बाद मौसम साफ़ हुआ और आतिश बाजी का आनन्द उठाया। यहाँ (नेहरु ग्राउंड) मेला लगाने में सबसे बड़ा योगदान, स्थानीय जमींदार ठाकुर तुलसीराम जी का रहा जिन्होंने गेहूं की लगी फसल को रौंदने दिया। और शायद उसके बाद उन्होंने इसे निशुल्क ग्राउंड को दे दिया। इस ग्राउंड और मेले के लिए हमें मंशाराम जी और तुलसीराम जी के सबसे अधिक आभारी होना चाहिए। आजकल भव्य शिरगुल मन्दिर भी मेला ग्राउंड के सिरे पर बन चुका है।
इनसेट में लाला मनशा राम जी। इनके अलावा फोटो में दिखे लगभग सभी का योगदान मेला आयोजित करने में रहा।
नेहरु ग्राउंड में आयोजित प्रथम मेले में हर विभाग की प्रदर्शनी लगी हुई थी। सांस्कृतिक कार्यक्रम में स्थानीय कलाकारों को अधिक समय दिया गया था। रेड मून इंडस्ट्री के मालिक लाल चंद जी वल्याट ने प्रोजेक्टर से पहली फिल्म दिखाई थी।
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ऐतिहासिक तथ्य......
राजगढ़ मेले से पहले यही मेला कुफ्फर धार (कुलथ से ऊपर) लगा करता था जिसे कुफ्फरे र प्लेच कहते थे जो परम्परागत मेला था। इसी तारीख को राजगढ़ में भी शुरू हो गया। बल्कि राजगढ़ स्कूल के बच्चे यहाँ PT शो दिया करते थे। लोग असमंजस में रहने लगे कि कहाँ जाएँ और कुफ्फर धार तथा राजगढ़ के दोनों मेले लगते रहे और अंत में कुफ्फर का मेला बंद हो गया।

फागू ''मोहड़'' (मठ से अपभ्रंश) का मन्दिर

यह फागू ''मोहड़'' (मठ से अपभ्रंश) का मन्दिर है। यह स्थान चूड़ धार जैसा ही तीर्थ स्थल है। हालांकि यहाँ महाभारत काल के मन्दिर अवशेष विद्यमान हैं परन्तु अब यह शिवालय मन्दिर है। यहाँ शिवलिंग स्थापित हैं जो शिरगुल महाराज के पिता भूखडू महाराज की तपस्थली होने का आभास करवाता है। यहाँ थान देवता के होने की भी मौखिक मौजूदगी है। देव यात्रा से पहले शिरगुल महाराज यहाँ जरुर आते हैं। दोनों देवता भाई शिरगुल एवं दधेश्वर यहीं आकर मिलते हैं। यहांके आसपास की सैंकड़ों बीघा जमीन इनकी ठकुराई के तहत आती थी। सारा बचपन दोनों देवताओं का यहीं बीता है।
लेकिन आजकल जीर्ण शीर्ण अवस्था में पडा है।

राजगढ़ बैशाखी मेला-2017

फागू : जिला सिरमौर के राजगढ़ बैशाखी मेला-2017 की दूसरी सांस्कृतिक संध्या में राजगढ़ तहसीलदार कपिल तोमर ने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की | मुख्यातिथि को हिमाचली
टोपी, शॉल और स्मृति चिन्ह भेंट करके सम्मानित किया गया । जिला स्तरीय मेले की दूसरी सांस्कृतिक संध्या भी अपना रंग नहीं जमा पाई और दूरदराज से आये लोगो को निराश होना पड़ा | पुरे कार्यक्रम में प्रसिद्ध कलाकारों में से कोइ भी अपनी विशेष छाप नहीं छोड़ सका | हालांकी मुख्य पहाड़ी पूर्ण शिवा ने अपनी गायकी से लोगो का मनोरंजन करने का भरपूर प्रयास किया लेकिन जब तक उन्होंने लगभग 9 .30 बजे के बाद स्टेज संभाला लोग उठकर जाने लग गये थे | उन्होंने सबसे पहले शिरगुल महिमा गुरु गोविन्दो रे पाव्टा साहिबा माई रेणुका रे ताला चुडे रे देवा शिरगला सिरमौरे तेरे आसरे चला ,उसके बाद उन्होंने बड़ी दूर से आये है प्यार का तोफा लाये है इसके पश्चात पूर्ण शिवा ने पहाड़ी नाटी ,पंजाबी सहित हिंदी फिल्मो के कई गाने गाये | मुख्य कलाकारो में से विनोद रांटा ने कम समय के बाबजूद पहाड़ी नाटी धारो पांदे लागो कुपटू मामा ,धारो आया बंजारा बेश्ना मेरी हमकुऐ,खिन्द्टा माथिये तेरे देना की ना ,घन्टी बाजो फ़ोनों रे तेरी ब्ब्लीय नाटी गाकर लोगो का मनोरंजन किया | स्थानीय कलाकारों
में दीपक चौहान , सुरेंदर शर्मा ,हिमांशी तंवर ,रीना ठाकुर ,किरण कश्यप ,हेरी ,सहित कई अन्य कलाकारों ने अपनी प्रस्तुती पेश की | स्थानीय कलाकारों ने मीडिया को अपनी बात कहते हुए बताया की जब भी वह अपनी परफोर्मेंस देते है तो अचानक ही औरकेसटरा ,और म्यूजिक सिस्टम खराब होने लग जाता है जो भी स्थानीय कलाकार गाने जाते है उनकी आवाज लोगो तक साफ सुनाई नहीं देती जबकि स्टार कलाकारों के लिय उपरोक्त दोनों सिस्टम अचानक से ठीक हो जाते है | स्थानीय कलाकारों ने औरकेसटरा ,और म्यूजिक सिस्टम पर भेदभाव करने के आरोप भी लगाये है

परसराम जी ग़ालिब एवं जगतराम जी

ये हैं परसराम जी ग़ालिब एवं जगतराम जी। ग़ालिब जी संगीत कलाकार हैं जबकि सफेद दाढ़ी वाले जगतराम जी बलिष्ठ हुआ करते थे। जब कुफ्फरधार पर मेला लगता था तो इन्होने राजगढ़ से चीनी की एक क्विंटल की बोरी और उसपर घी का 20 kg का टीन पीठ पर उठा कर पहले2 km उतराई उतरी पेरवी को और उसके बाद 3 km की खड़ी चढ़ाई चढी और बिना आराम किये एक ही बार में मेला स्थान पर पहुंचाई है। शायद इस बात की पहले 5 रु0 की शर्त लगी थी।

रतन कश्यप सेवानिवृत


वन विभाग में लम्बी सेवा के बाद रतन कश्यप 31 मार्च को सेवानिवृत हो गये। इस उपलक्ष में उन्होंने एक भव्य समारोह का आयोजन किया | रतन कश्यप ने वन विभाग में लगभग 36 वर्ष और एक माह तक नोकरी की और ऊना से बतोर वन परिक्षेत्र अधिकारी रिटायर हुए हैं | वैसे तो सेवानिवृती के उपलक्ष में पार्टी का आयोजन एक आम बात है लेकिन रतन कश्यप की रिटायरमेंट पार्टी लोगो के लिए चर्चा का विषय रही। यह एक भव्य पार्टी थी और उनके आगामी विधानसभा चुनाव में पच्छाद निर्वाचन क्षेत्र से मैदान में उतरने की उम्मीद भी की जा रही है | हालांकी उन्होंने चुनाव लड़ने की आधिकारिक घोषणा तो अभी तक नहीं की है लेकिन इसकी सुग्वुगाहट अवश्य ही आरम्भ हो चुकी है | वह किसी पार्टी से चुनाव लड़ेंगे या निर्दलीय उम्मीदवार होंगे यह बात भी स्पष्ट नहीं है लेकिन आजकल पुरे क्षेत्र में यह चर्चा का विषय है | रिटायरमेंट पार्टी पर भव्य आयोजन भी किसी शक्ती प्रदर्शन से कम नहीं था जिसमे हजारो लोगो ने शिरकत की | रतन कश्यप जिस तरह गाजे बाजे और भारी भीड़ के साथ
समारोह स्थल तक पहुंचे उसमे भी नेता की झलक दिखाई दे रही थी और उन्हें मुबारकबाद देने के लिए लोगो का हजूम उमड़ पड़ा था | हालांकी हजारो लोगो की उपस्थिती उनके निजी सम्बन्धो के कारण थी और उसका कोइ राजनीतिक कारण नहीं था लेकिन यदी वह चुनावी रण में कूदते है तो उन लोगो को भी मंच मिल जाएगा जो दोनों दलों से रुष्ट है | साथ ही पच्छाद की जनता को तीसरा विकल्प भी उपलब्ध हो जाएगा | पिछले कुछ माह से प्रदेश योजना बोर्ड उपाध्यक्ष और 6 बार विधायक रहे जी आर मुसाफिर और वर्तमान भाजपा विधायक सुरेश कश्यप पुरी तरह सक्रिय है और अगर रतन कश्यप भी मैदान में कूद पड़ते है तो किसी की भी जीत का समीकरण बिगाड़ सकते है | कुछ भी हो लेकिन उन्होंने जनता को चर्चा का विषय दे दिया है और उनके चुनाव लड़ने की बात हर कहीं सुनी जा सकती है

सरस्वती कलामंच के दो कलाकार स्तम्भ

सरस्वती कलामंच के दो कलाकार स्तम्भ......
सुशील भृगु एवं परसराम ग़ालिब।
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सुशील भृगु.... श्री रत्तीराम भृगु के पुत्र है। संगीत इन्हें विरासत में मिला है। पिता रत्तीराम जी रेडियो गायक आर्टिस्ट तो थे ही साथ में वे बहुत अच्छे गीतकार भी थे। उनके कई गीत आज भी पूरी तरह से छाये हुए हैं। वो नेता गिरी के भी शौकीन थे और डा0 परमार का सानिध्य प्राप्त था।
आज सुशील भृगु भी उन्हीं की विरासत को गति प्रदान किये हुए हैं।
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परसराम जी ग़ालिब....
ग़ालिब का तखल्लुस इन्हें स्कूल टाइम में ही मिल गया था। एक अचरज ही कहा जाएगा कि जब से दाढ़ी आई है तब से क्लीन शेव नहीं की है। एक तो ग़ालिब की तरह दाढी और ऊपर से गज़लों की गायकी से ये ग़ालिब के नाम से स्कूल में मशहूर हो गये। जब ये ट्रेनिंग ले रहे थे तो गजलें भी गाते थे और शक्ल भी वैसी ही थी इस पर प्रिंसिपल ने कहा कि आप तो वाकई ग़ालिब हैं। हालाँकि ये बहुत अच्छे क्लैर्नेट बजाते थे परन्तु एक तांत्रिक हादसे के बाद इन्होने उसे छोड़ दिया। ये हर महफिल की शान होते हैं और अपने मजाकिया स्वभाव से सभी को खुश रखते हैं।

सेवा निवृति आयोजन में सांस्कृतिक कार्यक्रम

रतन कश्यप की सेवा निवृति आयोजन में सांस्कृतिक कार्यक्रम की भी धूम रही। इस मौके पर सरस्वती कलामंच के कलाकारों द्वारा पेश किया गया माला नृत्य।

रेस प्रतियोगिता

ये हैं नोहराधार की योगा गर्ल मीनाक्षी ठाकुर जो सोलन कॉलेज में हुई रेस प्रतियोगिता में प्रथम स्थान पर रही।

पझोता आंदोलन

ये हैं पझोता आंदोलन के सूरमां जो राजा से भिड़ गए थे और अंग्रेजों की 1700 गोलियां खाई थी। आज इन में से कोई भी हमारे साथ नहीं। 59 आंदोलनकारी 5 साल तक जेल की यातनाएं सहते रहे। यदि भारत आज़ाद न होता तो दी गई उम्रभर की कैद काट की है घर आते यदि इस दौरान भगवान को प्यारे न हो जाते। यूँ भी तीन चार साथी तो जेल में ही शहीद हो गए थे।

प्राथमिक पाठशाला भाणत में वार्षिक पारितोषिक वितरण

प्राथमिक पाठशाला भाणत में वार्षिक पारितोषिक वितरण सम्पन्न। पांचवी कक्षा में सौरव केन्द्र सेर मनोण में प्रथम रहा।
इस मौके पर मुख्य अतिथि, मुख्याध्यापक, एसएमसी अध्यक्ष एवं सदस्य, अभिभावक तथा पुरूस्कृत विद्याथी।

प्रतियोगिता में जिला सिरमौर आलराऊंडर

हमीरपुर में सम्पन्न राज्यस्तरीय अंडर 14 एथेलेटिक्स एवं कल्चरल प्रतियोगिता में जिला सिरमौर आलराऊंडर। डीपीईओ रमेश सरैक, ओमप्रकाश चौहान एवं अन्य आफिशियल्ज को इस उपलब्धी के लिए बधाईयां।













धणेरा

यह धणेरा है, चांदी से निर्मित।
इसे क्यों धणेरा कहते हैं, इस पर शोध किया तो काफी रोचक तथ्य सामने आए I कभी समय था जब किसी देवता को धूप दीप देने यानि पूजा में प्रयोग होने वाली सामग्री को प्रज्जवल्लित करने के लिए, साधारण अग्नि नहीं बल्कि त्रियुगी नारायण अग्नि का प्रयोग किया जाता था। यह अग्नि केदारनाथ से आगे गौरीकुंड से लाई जाती थी जिसे यहां लाकर धूणे के रूप में हर समय जलाकर रखा जाता था। पुजारी लोग उसी धूणे से अग्नि ले जाकर धूप देते थे और उसे धूणा देना कहते थे। 
इसी लिए पूजने वाले पात्र को धूणा देने वाला यानि धणेरा नाम पड गया। इस धणेरे में देव चंदन, कत्रचार, बूं तथा गाय का घी डाला जाता है जिस पर उस समय धूणे से मगर आज चुल्हे से निकाले गए सुलगते अंगार रखे जाते हैं। उनके जलने से निकलने वाला धूंआ ही देवता की पूजा में धूप का काम करता है जबकि वातावरण में औषधीय सुगंध फैला देता है। त्रियुगी नारायण अग्नि की जानकारी पं० वेदप्रकाश ने दी। उनके अनुसार, कत्रचार और देवचंदन चूडधार के जंगलों से वर्षभर में एकबार जा कर लाया जाता है जबकि बूं नामक घास स्थानीय तौर पर मिल जाती है।

श्री इन्दरसिंह

ये हैं नम्बरदार जी के नाम से मशहूर श्री इन्दरसिंह जो जगास गांव से संबंधित हैं। ये टिपीकल वेषभूषा एवं मूंछ दाढी की बनावट से नहीं बल्कि एक मशहूर पहाडी गीत के रचयिता एवं गायक के रूप में जाने जाते हैं।
अपने जमाने का यह है मशहूर गीत, "मेरी जान भाभिए, आगे ओ तेरे मोरजे" । इसे कई गायकों ने रेडियो स्टेशन से भी गाया है। नम्बरदार जी स्वयं इसे मंचों पर गाते थे।
यह जानकारी मतियाना राजगढ के लोक गायक एवं नर्तक श्री रवींद्र वर्मा ने दी।


गांव "ढा"

यह है एक अक्षर के नाम का गांव "ढा"। यह दो गांव ढा-पितली साथ साथ हैं। क्षेत्र में एक-डेढ अक्षर के और भी गांव हैं जैसे, घो, शा, म्हो, ॠ इत्यादि।







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स्वर्गीय श्री रत्तीराम

ये हैं एक सदाबहार पहाडी भजन " किले रे कदावणे जोलो पाणी रे दीवे नारणा, पूजा कोरणे बिजटो रे" के रचयिता एवं आकाशवाणी से गाने वाले चेवडी गांव के स्वर्गीय श्री रत्तीराम जी। आज लोकनृत्य का शुभारंभ इसी भजन से होता है। इनके साथ एक और इतिहास भी जुडा है। डा० परमार के अकेलेपन को दूर करने के लिए, सत्या डांग को सत्या परमार बनाना, इनके ही प्रयासों का परिणाम था। रत्तीराम जी हंसमुख व्यक्तित्व के मालिक थे। वे रेणुका से एमएलए के लिए आजाद उम्मीदवार भी खडे हुए थे। करयाला के भी कलाकार थे।










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ड्रिफ्टवुड कला को जिन्दगी बनाने वाले श्री लक्ष्मीसिंह ठाकुर

ड्रिफ्टवुड कला को जिन्दगी बनाने वाले ये हैं श्री लक्ष्मीसिंह ठाकुर। ये सुन्दर एवं क्षेत्र के साफ सुथरे गांव टालिया के स्थाई निवासी हैं। कुछ वर्ष पहले इनकी पत्नी इन्हें अकेला छोड भगवान् के घर चली गई थी। अकेलेपन का साथी कोई नहीं था। झ्होंने ड्रिफट वुड कला को अपना मित्र बना कर बेकार पडी वस्तुओं, जडों, टहनियों, सूखे बीजों को सुव्यवस्थित करके कलात्मक रूप देना आरंभ कर दिया। इनके घर में ये कलात्मक वस्तुएं, उचित स्थान पर व्यवस्थित की गई है जिससे घर एक कलादीर्घा में परिवर्तित हो गया है। ये अपने कलासंसार में खोए २हते हैं। ध्यान रहे इनके एक पुत्र बहुत अच्छे काष्ठकलाकार हैं। वो भी इनका हाथ बंटाते रहते हैं।
ये है ड्रिफ्टवुड और काष्ठशिल्प के सामंजस्य से तैयार उनकी एक रचना, उनके साथ।







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पैराग्लाईडिंग वर्ल्डकप



आपको जानकर हर्ष होगा कि बीड बिलिंग में चल रहे पैराग्लाईडिंग वर्ल्डकप के आयोजन में राजगढ क्षेत्र की भी भागेदारी है। खुदा न करे कोई हादसा हो जाए तो, बथाऊधार राजगढ के श्री सोमदत्त सबसे पहले होंगे जो बचावकार्य का कार्य करेंगे। ज्ञात रहे, सोमदत्त जी, जिला सिरमौर के एकमात्र आईस स्कीयर हैं। इन्हें साहसिक खेलों के दौरान प्रशिक्षक एवं रेस्क्यु टीम के सदस्य के रूप में शामिल किया जाता है। इनके बारे में बता दूं, इन्होंने चूडधार से बथाऊधार तक स्कींग कर के रिकार्ड बनाया है। इसके इलावा इन्होंने चूडधार ढलान पर आधा दर्जन स्कींग स्लोप्स खोज २खे हैं। स्थानीय नेता चाहें तो सकींग गतिविधियों के लिए चूडधार विश्वप्रसिद्ध स्कींग स्थल बन कर उभर सकता है।
साभार शेर जंग चोहान